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वो कौन सा मुख्यमंत्री था जिसके बैंक खाते में 18 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी थे केवल 536 रूपए – हिमचाल इलेक्शन स्पेशल

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वो कौन सा मुख्यमंत्री था जिसके बैंक खाते में 18 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी थे केवल 536 रूपए - हिमचाल इलेक्शन स्पेशल
Image Source : Hill Post

जी हां आज हम बात करने वाले है एक ऐसे मुख्यमंत्री की जिनसे कांग्रेस पार्टी की तरफ से हिमाचल प्रदेश की कमान 18 साल संभाली और जब पद छोड़ा तो रोडवेज की बस पर बैठ कर अपने गाँव गए और उस वक़्त उनके खाते में थे केवल 536 rs.

हम जिस शख्स की बात कर रहे है उनका नाम है यशवंत सिंह परमार , इनको हिमचाल प्रदेश के जन्मदाता के रूप में भी देख जाता है।  यशवंत का जन्म ४ अगस्त 1904 को राजशाही परिवार की सचिव के घर हुआ था। यशवंत परमार को बचपन से ही पढ़ाई का बहुत शौक था, इस लिए वो उस वक़्त के भारत लाहौर मैं पढ़ने गए , और फिर 1944 में लकनऊ यूनिवर्सिटी से Ph.d किया वो भी लॉ मैं।  वापिस आये तो हिमाचल में ही जज की कुर्सी संभाल ली।
लेकिन जल्द ही यशवंत सिंह परमार को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा या यु कहे की उन्होने खुद ही वो पद छोड़ दिया। क्योकि वो राजशाही के खिलाफ थे और कांग्रेस की एक यूनिट प्रजा मंडल के सक्रिय सदस्य थे।  देश की आदाज़ी के बाद, जब सारे सुबो को भारत में जोड़ा जा रहा था , तब हिमाचल को लेकर एक फार्मूला सामने आया , उस फॉर्मूले के तहत ४ जिलों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश  राज्य बना लिया जाये, लेकिन राज्य का सञ्चालन दिल्ली से हो।  तब यशवंत परमार हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री बने। लेकिन जब १९५६ में हिमाचल की सायित्वता पूरी तरह सम्पत कर दी गयी तो वो खुद ही अपनी गद्दी छोड़ दी और दिल्ली में अपनी सेवाय देने लगे।
यशवंत सिंह परमार फिर एक बार जब हिमचाल प्रदेश ने अपना पूर्ण स्वरुप लिया १९६३ , इंदिरा गाँधी के ज़माने में तो फिर से उनको मुख्या मंत्री की  संभाली और इमरजेंसी ख़तम होने तक यानी १९७७ तक मुख्या मंत्री रहे।
१९७७ में इंदिरा गाँधी ने संजय गाँधी के करीबी ठाकुर रामलाल जिन्होंने संजय के पसदीदा काम नसबंदी को पुर जोर तरीके से  किया था , लोग कहते है  इनाम था।
जब 1977 यशवंत सिंह परमार अपना इस्तीफा देकर वापिस हिमाचल लौटे  रोडवेज की बस से अपने गाओं गए और उस वक़्त उनके अकाउंट में बस 536 रूपए थे।  आज के ज़माने में ये बात सुनकर अटपटा जरूर लगता है , पर ये उस वक़्त की सादगी थी।
यशवंत सिंह परमार के नाम ढेरो उपलब्धिया है , हिमाचल के विकास के लिए।  जब उन्होंने मुख्या मंत्री का पद दुबारा संभाला था तो हिमाचल में सिर्फ २५० किलो मीटर ही सड़क थी और आज ३०,००० किलोमीटर से भी ज्यादा इनमे उनके योगदान को नहीं भुला जा सकता। वो यशवंत सिंह परमार ही थे जो १९७२ में लैंड रिफार्म बिल लेकर आये , जिसके तहत कोई बहार का शख्स किसी विशेष परिस्थति के अलावा हिमाचल में जमीन नहीं ले सकता।
१९७७ में रिजाइन करने के बाद परमार अपने ग्राम में ही रहने लगे , सन १९७८ में उनका एक्सीडेंट एक्सीडेंट हो गया , और वो चलने फिरने से लाचार हो गया , फिर १९७९ में ये पता चला की परमार शाब को कैंसर ने भी जकड लिया है और इसी चलते सन्न 1981 में डॉ. यशवंत सिंह परमार की मृत्यु हो गयी।
यशवंत सिंह परमार का मानना था की राजनीतिज्ञ के बच्चो को राजनीती से दूर रहना चाहिए , इसी लिए उनके जीते जी किसी भी बच्चे ने राजनीती में कदम नहीं रखा , लेकिन उनके निधन के बाद उनके बेटे कुश परमार ने चुनाव लड़ा और ५ बार  वो विधायक भी रहे। राजनीती की विडम्बना देखिये जिंदगी भर कांग्रेस की सेवा करने वाले यशवंत सिंह परमार के पोते और कुश परमार के बेटे अभी हाल ही में भाजपा ज्वाइन कर लिया।
यशवंत परमार अपने में एक महान हस्ती थे , वो हमेशा सामाजिक भुराईयो के लिए लड़ाई करते नज़र आते थे।  इसकी जीती जागती मिसाल तब मिली जब उन्होंने एक विधवा से शादी कर ली।  वो विधवा कोई और नहीं कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सत्य वती दांग थी , जो की १९६४ से १९६९ तक हिमाचल कांग्रेस की अधयक्षय रही।  सत्यवती , परमार की मृत्य के पश्चात अपने एक बच्चे के साथ विदेश में  बस गयी।
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